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अध्याय-4

मेमोरी (MEMORY]
  • यह मेमोरी कम्प्यूटर को आन्तरिक भण्डारण क्षेत्र है।
  • मेमोरी में जमा डाटा और निर्देश की प्रोसेसिंग की जाती है तथा आउटपुट मिलता है।
  • मेमोरी कम्प्यूटर का एक अभिन्न अंग है।
डाटा प्रतिनिधित्व (Data Representation)
  • यह मेमोरी बहुत सारे सैल में बँटी होती है जिन्हें लोकेशन कहा जाता है।
  • हर लोकेशन का एक अलग लेबिल होता है जोकि एड्रेस कहलाता है।
  • सैल का उपयोग डाटा तथा निर्देश को संग्रहित करने के लिए किया जाता है।
  • यह बर्ड लेन्थ 8,16,32,64 बिट की हो सकती है।
  • बिट बाइनरी डिजिट की सबसे छोटी इकाई है।
मेमोरी के प्रकार (Types of Memory)
  • सेमीकण्डक्टर (Semiconductor) याप्राथमिक (Primary) या मुख्य (Main) मेमोरी
  • कैश (Cache)
  • अस्थायी (Volatile)
  • स्थायी (Non-volatile) - रोम (ROM) -- प्रॉम् । - ई-प्रॉम ई-ई प्रॉम
  • रैम (RAM)
  1. द्वितीयक (Secondary) या सहायक (Auxiliary) या बेकिंग स्टोर (Backing Store) मेमोरी
  • हार्ड डिस्क
  • मैग्नेटिक टेप
  • सीडी रोम
  • फ्लॉपी डिस्क
  • पेन ड्राइव
  • फ्लैश मेमोरी
  • डीवीडी
(A) प्राथमिक संग्रहण

यह वह युक्तियाँ होती हैं जिसमें डाटा व प्रोग्राम्स तत्काल प्राप्त एवं संग्रह किये जाते हैं।

रीड-राइट मेमोरी, रैम (RAM)-इस मेमोरी में प्रयोगकर्ता अपने प्रोग्रम को कुछ देर के लिए संचित कर सकते हैं, यही कम्प्यूटर की बेसिक मेमोरी भी कहलाती है।

यह निम्नलिखित दो प्रकार की होती हैं।

1. स्टैटिक रैम (SRAM)-स्टैटिक रैम में संचित किए गए आँकड़े स्थित रहते हैं। इस RAM में बीच के दो आँकड़े मिटा दिए जाएँ, तो इस खाली स्थान पर आगे वाले आँकड़े खिसक कर नहीं आएँगे।

2. रीड ओनली मेमोरी (Read Only Memory)--इसमें लिखे हुए प्रोग्राम के आउटपुट को केवल पढ़ा जा सकता है, परन्तु उसमें अपना प्रोग्राम संचित नहीं किया जा सकता। बेसिक इनपुट आउटपुट सिस्टम (BIOS) नाम का एक प्रोग्राम ROM का उदाहरण है, जो कम्प्यूटर के ऑन होने पर उसका सभी इनपुट आउटपुट युक्तियों की जाँच करने एवं नियन्त्रित करने का काम करता है।

प्रोग्रामेबिल रॉम (PROM: Programmable Read Only Memory)इस स्मृति में किसी प्रोग्राम को केवल एक बार संचित किया जा सकता है परन्तु न तो उसे मिटाया जा सकता है और न ही उसे संशोधित किया जा सकता है। मिटाया जा सकता है।

इरेजेबिल प्रॉम (EPROM: Erasable Programmable Read Only Memory)-इसमें संचित किया गया प्रोग्राम पराबैंगनी किरणों के माध्यम से मिटाया जा सकता है

(EPROM: Electricaly Erasable Programmable Read Only Memory)- इलेक्टिकली इरेजेबिल प्रॉम पर स्टोर किये गए प्रोग्राम को मिटाने अथवा संशोधित करने के लिए किसी अन्य उपकरण की आवश्यकता नहीं होती। कम्प्यूटर में उपलब्ध इलेक्ट्रिक सिगनल्स ही इसे प्रोग्राम को संशोधित कर देते हैं।

(B) द्वितीयक संग्रहण

यह एक स्थाई संग्रहण युक्ति है। इसमें संग्रहित डाटा तथा प्रोग्राम्स कम्प्यूटर के ऑफ होने के बाद भी इसमें स्थित रहते हैं।

मैग्नेटिक टैप-इसमें 1/2 इंच चौडाई वाली प्लास्टिक की बिना जोड वाली लम्बी पट्टी होती है जिस पर फैरोमैग्नेटिक पदार्थ की परत चढ़ाई जाती है।।

मैग्नेटिक डिस्क-इसमें सभी डिस्क  एक के ऊपर एक समान्तर लगी होती हैं। सभी डिस्कों के बने इस माध्यम को डिस्क पैक कहते हैं। डिस्क पैक में। 11 अथवा 20 ऐसी सतहें होती हैं।

फ्लॉपी डिस्कयह एक छोटी लचीली डिस्क होती है जिसकी डाटा संग्रह करने की क्षमता बहुत अधिक नहीं होती। एक लचीली प्लास्टिक शीट के ऊपर मैग्नेटिक ऑक्साइड कोडिंग करके इसे तैयार किया जाता है।
रेण्डम एक्सेस मेमोरी (RAM)
रीड ओनली मेमोरी (Read Only Memory)
  • संग्रह क्षेत्र का उपयोग अस्थायी तौर से प्रोग्राम रखने और डाटा की प्रक्रिया करने के लिए किया जाता है।
  • संग्रह क्षेत्र का उपयोग किसी कम्प्यूटर की कार्रवाई के लिए आवश्यक   निर्देशों को रखने के लिए किया जाता है। ये निर्देश स्थायी रूप से संग्रहीतकिए जाते हैं। वे मिटाए नहीं जा सकते या संशोधित नहीं किए जा सकते।
  • बिजली की आपूर्ति जिस क्षण बन्द कर दी जाती है तो डाटा खो जाता है।
  • कम्प्यूटर को भले ही बन्द कर दिया जाय उसके बाद भी डाटा नहींखोता।
फ्लॉपी डिस्क
फ्लॉपी डिस्क
CD-ROM
 DVD
डिस्केट या फ्लॉपी के रूप में भी सन्दर्भित
 फिक्स्ड डिस्क के रूप में भी सन्दर्भित
कॉम्पैक्ट डिस्क के रूप में भी सन्दर्भित
डिजिटल परिवर्तनशील डिस्क के रूप में सन्दर्भित
निकालने योग्य
सामान्यत: सिस्टम इकाई से
निकालने योग्य
निकालने योग्य
लचीले विनायल की सामग्री से बनी हुई
ताप, धूल और चुम्बकीय क्षेत्रों से नुकसान होने के प्रति कम  पतिरोधी
क्षति पहुँचने की कम सम्भावना  चूँकि यह सिस्टम इकाई के  भीतर होती है और इस प्रकार  पैक की जाती  है कि हवा जाने की भी जगह नहीं होती है
विश्वसनीय, क्योंकि डाटा को  किसी CD राइटर (केवल रीराइट करने योग्य CD) के बिना परिवर्तित नहीं किया जा सकता
1:44 एमबी की संग्रह क्षमता
40 जीबी या इससे अधिक डाटा संग्रह करता है
650 एमबी से लेकर 700 एमबी तक का डाटा संग्रह करता है
कम से कम 4-7 जीबी का डाटा संग्रह करता है।
डाटा पढ़ता और लिखता है
डाटा पढ़ता और लिखता है
रीड-ओनली (एक बार लिख दिया गया हो तो डाटा को कभी मिटाया या अधिलेखित नहीं किया जा सकता )
केवल पढ़ने हेतु
(I) डायनैमिकरम (Dynamic RAM)-इससे डाटा को बार-बार रीफ्रेस करना होता है और यह स्टैटिक रैम की तुलना में सस्ता है।

(II)कैश मेमोरी (cache Memory)यह मुख्य मेमोरी और CPU के बीच एक तीव्र मेमोरी है जिसमें बार-बार प्रयुक्त होने वाले डाटा तथा निर्देश संगृहीत रहते हैं।

(ii) हार्ड डिस्क (Hard Disk)
  •   यह एल्युमीनियम की बनी होती है। इस डिस्क पर चुम्बकीय पदार्थ का लेप लगा रहता है।
  •   इनकी भण्डार क्षमता बहुत अधिक होती है।
  •   यह कम्प्यूटर में लगी हुई हार्ड डिस्क को 'C' ड्राइव का नाम दिया जाता है।
(iv) सी. डी. रोम (Compact Disk Read Only Memory) 
  • सीडी पर लिखने के लिए सीडी राइटर का प्रयोग होता है।
  • इनमें डाटा पढ़ने की गति हार्दिक की अपेक्षा धीमी होती है
  • यह डिस्क पर डाटा लिखने की क्रिया को डाटा  बर्न करना कहते हैं
  • इसके ऊपर लिपिक पदार्थ में प्रकाश की किरण परावर्तित होती है
(V) DVD (DIGITAL VIDEO DISK)
  • यह सीडी रोम की तरह होती है लेकिन उसकी भंडारण क्षमता बहुत अधिक होती है
  • इनमें ध्वनि के लिए डॉल्बी डिजिटल डिजिटल थिएटर सिस्टम का प्रयोग होता है
(VI) पेन ड्राइव(PEN DRIVE)

  • स्तन के आकार की लक टॉनिक मेमोरी है उसे यूएसबी पोर्ट में लगा कर डाटा को संग्रहित या पढ़ा जा सकता है
  • इनको  फ्लैश  drive भी कहा जाता है


अध्याय-3

इनपुट और आउटपुट डिवाइस [INPUT AND OUTPUT DEVICE)

जिन युक्तियों का प्रयोग डाटा और निर्देशों को कम्प्यूटर में प्रविष्ट कराने के लिए किया जाता है, वे सभी युक्तियाँ आगम अवा इनपुट डिवाइस (Input Device) है। यह भी कहा जा सकता है कि मानवीय भाषा में प्रविष्ट किए जा रहे डाटा अथवा प्रोग्राम को कम्प्यूटर के समझने योग्य रूप में परिवर्तित करने के लिए प्रयोग की जाने वाली युक्तियों को इनपुट युक्तियाँ कहा जाता है।

इनपुट युक्तियों के उदाहरण-की-बोर्ड, टैकर बॉल, लाइट पेन, जायस्टिक, हैण्ड-हैल्ड टर्मिनल, बार कोड रिकॉग्नीशन, OMR,OCR and MICR

(i) की-बोर्ड (Key-board) मुख्य और सुगम ऑनलाइन इनपुट डिवाइस है। यह एक टाइपराइटर के समान कुजियों वाला उपकरण  है । इसमें कुंजियों की संख्या टाइपराइटर से अधिक होती है।
की-बोर्ड की सभी कुंजियों को हम चार श्रेणियों में बाँट सकते हैं-
  • एल्फान्यूमेरिक कंजियाँ
  • न्यूमेरिक पैड
  • फंक्शन-कुंजियाँ
  • विशिष्ट उद्देशीय कुंजियाँ।

(ii) माउस (Mouse)—यह एक ऑनलाइन इनपुट डिवाइस है जिसे हम अपने हाथ में पकड़कर काम में लेते हैं। समतल सतह पर माउस को खिलाने से इसमें नीचे लगी बॉल घूमती है, जो माउस में लगे छोटे-छोटे रोलरों को संवेदित करती है।

(iii) ऑप्टीकल मार्क रीडर (OMR : Optical Mark Reader)--यह किसी कागज पर पेन्सिल या पेन के चिह्न की उपस्थिति और अनपस्थिति को जाँचती है। यह तकनीकी केवल छपे हुए कार्ड या फार्म पर निश्चित स्थानों पर बने बक्सों और पेन्सिल से भरे बक्सों को जाँचती है।

(iv) ऑप्टीकल कैरेक्टर रिकॉग्नीशन (OCR : Optical Character Recognition)--एक ऐसी तकनीक है जिसमें पहले से छपे कैरेक्टर्स को परस्पर फर्क देखकर मानक कैरेक्टर्स से पहचान की जाती है।

(v) मैग्नेटिक इंक कैरेक्टर रीडर (MICR : Magnetic Ink Character Reader)-बैंकिंग में अधिक उपयोग की जाने वाली तकनीक है, जहाँ अधिक संख्या में चेक जाँचे जाते हैं। इस तकनीक में चेक पर विशेष चुम्बकीय स्याही द्वारा कैरेक्टर छपे होते हैं। रीडर चेक पर छपे कैरेक्टर को चुम्बकीय कॉइल के संवेदन से पढ़ता है।

(vi) स्कैनर (Scanner)—ये कम्प्यूटर में किसी पृष्ठ पर बनी आकृति या लिखित सूचना को सीधे इनपुट करता है। इसका मुख्य लाभ यह कि यूजर को सूचना टाइप नहीं करनी पड़ती है।

(vii) जॉयस्टिक (Joystick)यह खेल खेलने के काम में आने वाली डिवाइस है। जॉयस्टिक के माध्यम से स्क्रीन पर उपस्थित टर्टर या आकृति को इसके हैण्डल से पकड़ कर चलाया जा सकता है।

(viii) लाइट पेन (Light Pen)–लाइट पेन का कम्प्युटर स्क्रीन पर कोई भी आकृति बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। लाइट पेन में एक फोटो सेल होता है लाइट पेन की टिप से कम्प्यूटर स्क्रीन पल्स स्क्रीन से ट्रॉन्समिट होकर प्रोसेसर के अन्दर प्रवेश कर जाती है।

(ix) डिजीटाइजर टेबलेट या ग्राफिग टेबलेट (Digitizer Tablet)–ग्राफिग टेबलेट एक ड्राइंग सतह होती है इसके ऊपर पेन या माउस होता है। ड्राइंग सतह में पतले तारों का जाल होता है जिस पर पेन या माउस को चलाने से संकेत कम्प्यूटर में चले जाते हैं।

(x) टच स्क्रीन (Touch Screen)—सारे टच टर्मिनल एक सेन्सीटिव स्क्रीन रखते हैं जिनमें कि एक की-बोर्ड होता है तथा वह डाटा को इनपुट कराने की अनुमति प्रदान करता है।

आउटपुट डिवाइस (Output Device) 

(i) मॉनीटर (Monitor)
  • मॉनीटर आउटपुट डिवाइस चित्र या प्रोसेस इनपुट की रिजल्ट को स्क्रीन पर दिखाता है।
  • ये कम्प्यूटर और यूजर के बीच सम्बन्ध स्थापित करता है।
(ii) प्रिण्टर (Printer)
  • यह एक मुख्य आउटपुट डिवाइस है। इसके द्वारा प्रिण्टेड कॉपी या हार्ड कॉपी कागज पर प्राप्त की जाती है।
(iii) स्पीकर (Speaker)
  • स्पीकर ध्वनि के रूप में आउटपुट देता है।
  • इनके लिए CPU में साउण्ड का कार्ड होना आवश्यक है।
  • इनका उपयोग संगीत या किसी तरह की ध्वनि सुनने में होता है।
(iv) प्लॉटर (Plotter)
  • प्लॉटर एक साउण्ड डिवाइस है, जिसका उपयोग ग्राफ प्राप्त करने के लिए होता है।
  • इनका उपयोग इंजीनियर, चिकित्सक, वास्तुविद, सिटीप्लॉनर, आदि करते हैं।
  • प्लॉटर ग्राफ तथा रेखाचित्र जैसे आउटपुट प्रदान करता है। .
(v)स्कीन इमेज प्रोजेक्टर (Screen Image Projector)
  • यह एक हार्डवेयर डिवाइस है, जो बडी सतह पर्दे पर चित्रों को दिखाता है।  
  • इसका प्रयोग प्रस्तुतियों और बैठकों में किया जाता है।


अध्याय-2
कम्प्यूटर की उत्पत्ति एवं विकास
[COMPUTER'S EXISTENCE AND DEVELOPMENT]
 कम्प्यूटर का इतिहास
हालाकि आधुनिक कम्प्यूटरों को अस्तित्व में आये हुए मुश्किल से 50 वर्ष ही हुए हैं. लेकिन उनके विकास का इतिहास बहुत पुराना है । कम्प्यूटर का जो रूप हम आजकल देख रहे हैं, वह अचानक ही प्राप्त नहीं हुआ, बल्कि यह हजारों वर्षों की वैज्ञानिक खोजों का फल है।
 जबसे मनुष्य ने गिनना सीखा है, तभी से उसका यह प्रयास रहा है कि गणना करने में सहायता करने वाले यन्त्र का निर्माण किया जाए। संख्या पद्धति (Number System) के प्रयोग तथा भारतीय गणितज्ञों द्वारा ‘शन्य' का आविष्कार किये जाने के बाद मानव के लिए संख्याओं का महत्त्व बहुत बढ़ गया था,
गणना में सहायक यन्त्रों की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। इसके परिणामस्वरूप सबसे पहले गिनतारा (Abacus) अस्तित्व में आया और बाद में भी कई यन्त्रों का निर्माण किया गया। इनका संक्षिप्त परिचय निम्न प्रकार है

(i) गिनतारा (Abacus)—यह सबसे पहला और सबसे सरल यन्त्र है जिसका प्रयोग गणना करने में सहायता के लिए किया गया था। इसका इतिहास | 5000 वर्ष से भी ज्यादा पुराना है। ईसा पूर्व 3500 से 3000 में चीन में इसका व्यापक उपयोग होने के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। आश्चर्य की बात यह है कि गिनतारा आजकल भी अपने प्रारिम्भक रूप में ही रूस, चीन, जापान, पर्वी एशिया के देशों तथा भारत में भी कुछ स्कूलों में प्रयोग किया जाता है।

(ii) नापयरा बान (Napier's Bones)—स्कॉटलैण्ड के गणितज्ञ जॉन नेपियर ने सन् 1617 में ऐसी आयताकार पट्टियों का निर्माण किया था, जिनकी सहायता से गुणा करने की क्रिया अत्यन्त शीघ्रतापर्वक की जा सकती थी। ये पट्टियाँ जानवरों की हड्डियों से बनी थीं, इसलिए इन्हें नेपियरी बोन कहा गया।

(iii) स्लाइड रूल (Slide Rule)-जॉन नेपियर ने सन 1617 में गणनाओं की लघुगणक (Logarithm) विधि का आविष्कार कर लिया था। इस विधि मदा संख्या का गुणनफल, भागफल, वर्गमूल, आदि किसी चुनी हुई संख्या के घातांकों को जोडकर या घटाकर निकाला जाता है। आज भी बड़ी-बड़ी गणना में, यहां तक कि कम्प्यूटर में भी. इस विधि का प्रयोग किया जाता है। सन् 1620 में जर्मनी के गणितज्ञ विलियम ऑटरेड ने स्लाइड रूल नामक एक एसी वस्तु का आविष्कार किया, जो लघुगणक विधि के आधार पर सरलता से गणनाएँ कर सकती थी। इसमें दो विशेष प्रकार की चिह्नित पट्टियाँ होती हैं, जिन्ह बराबर में रखकर आगे-पीछे सरकाया जा सकता है। इन पर चिह्न इस प्रकार पडे होते हैं कि किसी संख्या की शुन्य (Zero) वाले चिह्न से वास्तविक दूरी उस संख्या के किसी साझा आधार पर लघुगणक के समानुपाती होती है।
स्लाइड रूल का उपयोग वैज्ञानिक गणनाओं में कई शताब्दियों तक किया जाता रहा। बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक में पॉकेट कैलकुलेटरों के आने के बाद ही इनका प्रयोग बन्द हुआ है।

(iv) पास्कल का कैलकुलेटर (Pascal's Calculator)–गणनाएँ करने वाला पहला वास्तविक यन्त्र महान फ्रांसीसी गणितज्ञ और दार्शनिक ब्लेज पास्कल ने सन् 1642 में बनाया था। इसे पास्कल का कैलकुलेटर या पास्कल की एडिंग मशीन कहा जाता है। इस मशीन का प्रयोग संख्याओं को जोड़ने और घटाने में किया जाता था। जब पास्कल केवल 18 वर्ष का था, तब अपने टैक्स सुपरिटेंडेण्ट पिता की सहायता के लिए उसने यह यन्त्र बनाया था।

(v) लेबनिज का यान्त्रिक कैलकुलेटर (Mechanical Calculator of Leibnitz)–जर्मन गणितज्ञ लेबनिज ने सन् 1671 में पास्कल के कैलकुलेटर में कई सुधार करके एक ऐसी जटिल मशीन का निर्माण किया, जो जोड़ने तथा घटाने के साथ ही गुणा करने तथा भाग देने में भी समर्थ थी। इस यन्त्र से गणनाएँ करने की गति बहुत तेज हो गयी। इस मशीन का व्यापक पैमाने पर उत्पादन किया गया। अभी भी अनेक स्थानों पर इससे मिलती-जुलती मशीनों का उपयोग किया जाता है।

(vi) बैबेज का डिफरेंस इंजन (Difference Engine of Babbage)–कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के गणित के प्रोफेसर चार्ल्स बैबेज (1792-1871) को आधुनिक कम्प्यूटरों का जनक (पिता) कहा जाता है। गणित के क्षेत्र में उनका पहला महत्त्वपूर्ण योगदान था एक ऐसा यन्त्र बनाना, जो विभिन्न बीजगणितीय फलनों का मान दशमलव के 20 स्थानों तक शुद्धतापूर्वक ज्ञात कर सकता था। इस मशीन को डिफरेंस इंजन कहा जाता था, क्योंकि यह इस सिद्धान्त के आधार पर बनाया गया था कि किसी बीजगणितीय बहुघातीय फलन (Polymial) में आस-पास के दो मानों का अन्तर सदा नियत रहता है।

(vii) बैबेज का एनालिटिकल इंजन (Analytical Engine of Babbage)-अपने डिफरेंस इंजन की सफलता और उपयोगिता से प्रेरित होकर चार्ल्स लैबेज ने एक ऐसे यन्त्र की पूरी रूपरेखा (Design) तैयार की जो आजकल के कम्प्यूटरों से आश्चर्यजनक समानता रखती है। इस मशीन को एनालिटिकल इंजन कहा गया। इस प्रस्तावित मशीन के पाँच प्रमुख भाग थे

1. इनपुट इकाई–आँकड़ों को ग्रहण करने के लिए।
2. स्टोर–आँकड़ों तथा निर्देशों को संग्रहीत या भण्डारित करने के लिए।
3. मिल–अंकगणितीय क्रियाएँ करने के लिए।
4. कंट्रोल-स्टोर तथा मिल में संख्याओं और निर्देशों के आवागमन के लिए
5. आउटपुट इकाई–परिणाम छापने के लिए।

(viii) जेकार्ड्स लूम (Jacquard's Loom) फ्रांस (1804 ई.) में इस यन्त्र का आविष्कार हुआ। जैसेफ मैरीजेकार्ड् ने खोज की।
इस मशीन को विशेषता थी
 1.पंचकाई के उपयोग से सूचना और निर्देशों को कोडित किया जाता था।
2. यह पंचकार्ड में कोडित सूचना तथा निर्देशों का समूह एक प्रोग्राम के रूप में कार्य करता था।

(ix) होलेरिथ सेनास टेबुलेदर (hollerinch Census Tabulator)--

  • अमेरिका (1880 ई.) में इस मशीन का आविष्कार हुआ।
  • डॉ. हर्मन होलेरिथ इस मशीन के आविष्कारक थे। ।
  • जनगणना कार्य के लिए इस मशीन का आविष्कार हुआ।
  • यान्त्रिक इस कम्पनी को मशीनें होती थीं।
(x)एटानासोक बेरी कम्प्युटर (ABC)
  • 1937 ई. में इस मशीन का आविष्कार हुआ।  
  • डॉ. जॉन वी, एटानासोफ तथा क्लीफार्ड बेरी इस मशीन के आविष्कारक थे।
(xi) एनिएक (ENIAC-Econic Numental Integrated Calculator) से विश्व का प्रथम इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर एनिऐक है।
  • अमेरिका (1946 ई.) में इस मशीन का आविष्कार हुआ है।
  • आधुनिक कम्प्यूटर का प्रोटोटाइप Mark-1 को माना जाता है। (vi) (xii)यूनिवैक-1(UNIVAC-1) 
  • 1951 ई. में इस कम्प्यूटर का विकास हुआ।
  •  Universal Automatic Computer यूनिवैक को कहा जाता है।
  • • कम्प्यूटर को प्रथम  पीड़ी के इस मशीन में गुण हैं।
 हार्डवेयर के आधार पर वर्गीकरण

 (i) प्रथम  पीढी (First Generation) (1942-1955 AD)

  • इस पीढी के कम्प्यूटरों में वैक्यूम  ट्यूबो का प्रयोग किया जाता था।
  • इस पीढी का समय मोटे तौर पर सन् 1946 से 55 तक माना जाता था। ।
  • उस समय वैक्यूम  ट्यूब ही एकमात्र इलैक्ट्रॉनिक पुर्जा था जो उपलब्ध होता था।
  • इस पीढी के कम्प्यूटर आकार में बहुत बड़े होते थे।
(ii) दूसरी पीढी(Second Generation) (1955-1965 AD)

  • इस पीढी के कम्प्यूटरों का समय सन् 1955 से 1965 तक माना जाता है।
  • दूसरी पीढी के कम्प्यूटर की गति और संग्रहण क्षमता भी तेज थी।
  • इससे पहले हो अमेरिका को बैल लैबोरेटरी ने ट्रांजिस्टर की खोज कर ली थी।
  • इस पीढी के अन्य कम्प्यूटर थे-आई.बो. एम(IBM).-1602, आई बी एम-7094-1, सी डी  सी,3600 आर सो ए. 501 univac 1107 आदि।।
(iii) तीसरी पीढी (Third Generation) (1965-1975 AD)

  • इस पीढी के कम्यूटरों का समय सन् 1965 से 1975 तक माना जाता है।
  • इनमें एकीकृत परिपथों या चित्रों का उपयोग किया जाता था।
  • इस पीढी के कम्प्यूटर आकार में छोटे होने के साथ-साथ सस्ते भी थे।
(iv) चौथी पीढ़ी (Fourth Generation)
  • इनमें बिजली की खपत बहुत कम होती है।
  • इस पीढी के कम्प्यूटरों का समय सन् 1975 से 1990 तक माना जाता है।
  • रैम को क्षमता में वृद्धि से समय को बचत हुई तथा कार्य अत्यन्त  तीव्र गति से होने लगा।
(v) पाँचवी पीढी (Fifth Generation) 

  • सन् 1990 के बाद के समय में ऐसे कम्प्यूटरों के निर्माण का प्रयास चल रहा है।
  • जिनमें कंप्यूटिंग की ऊंची क्षमताओं के साथ-साथ तर्क करने निर्णय लेने तथा सोचने का भी समर्थय हो।
  • वैज्ञानिकों का दावा है पंचम पीढ़ी के कंप्यूटर मानव के दिमाग की तरह होंगे।
 विशेष एवं सामान्य उद्देश्य के कम्प्यूटर्स 

(i) विशेष उद्देश्य के कम्प्यूटर्स (Special Purpose Computer) ।
  • ये ऐसे कम्प्यूटर होते हैं, जो किसी विशेष कार्य के लिए ही तैयार किये जाते हैं।
  • उस कार्य की आवश्यकता के अनुसार ही उसमें सी.पी.यआदि आन्तरिक अवयव तथा बाहरी उपकरण जोड़े जाते हैं
 (ii) जनरल परपज कम्प्यूटर (General Purpose Computers)
  •  इसका प्रयोग किसी विशेष कार्य के लिए नहीं होता है।
  •  यह कम्प्यूटर एक से अधिक कठिनाइयों को दूर करने में सक्षम होते हैं।
  • इनका उपयोग साधारण अकाउण्टिंग से लेकर जटिल अनुरूपण तथा पूर्वानुमान में होता है।
कार्य पद्धति के आधार पर वर्गीकरण
(i) डिजिटल कम्प्यूटर (Digital Computer)
  •  इनकी गणना 0 या 1 से निरूपित की जाती है।
  •  यह डिजिटल कम्प्यूटर आँकड़ों को इलेक्ट्रॉनिक पल्स के रूप में व्यक्त किया जाता है।
  •  यह आधुनिक डिजिटल कम्प्यूटर में द्विआधारी पद्धति प्रयुक्त होती है।
 (ii) एनालॉग कम्प्यूटर (Analog Computer)
  • कम्प्यूटर में विद्युत के एनालॉग रूप का उपयोग किया जाता है।
  • इसकी गति धीमी होती है।
(iii) हाइब्रिड कम्प्यूटर (Hybrid Computer)
  •  यह कम्प्यूटर डिजिटल तथा एनालॉग का मिश्रित रूप है।
  •  इनमें इनपुट और आउटपुट एनालॉग रूप में व्यक्त होता है।
(iv) प्रकाशीय कम्प्यूटर (Optical Computer)
  • पाचवी पीढ़ी के कम्प्यूटरों के रूप में इस प्रकार के कम्प्यूटर बनाए जा रहे हैं जिनमें एक अवयव को दूसरे से जोड़ने का कार्य ऑप्टिकल फाइबर के तारों से किया जाता है।
 (v) एटॉमिक कम्प्यूटर (Atomic Computer)
  • ऐसे एटॉमिक कम्प्यूटर की खोज की जा रही है जो कुछ विशेष प्रोटीन अणुओं को एकीकृत परिपथ में बदलते हैं।
आकार के आधार पर वर्गीकरण 

(i) मेनफ्रेम कम्प्यूटर Mainframe Computer)
  • इसमें कार्य करने की क्षमता और गति अत्यन्त तीव्र होती है।
  • उपयोग–बैंकिंग, अनुसन्धान, रक्षा, अन्तरिक्ष, आदि के क्षेत्र में।
(ii) मिनी कम्प्यूटर (Mini Computer)
  • मिनी कम्प्यूटर का आकार मेनफ्रेम से काफी छोटा होता है।
  • इन पर एक साथ कई लोग काम कर सकते हैं।
  • उपयोग–कम्पनी, यात्री, आरक्षण, अनुसन्धान, आदि में।
(iii) माइक्रो कम्प्यूटर (Micro Computer)
  • माइक्रो कम्प्यूटरों में प्रोसेसर के रूप में माइक्रो प्रोसेसर का प्रयोग किया जाता है।
  • इनमें इनपुट के लिए की-बोर्ड और आउटपुट देखने के लिए मॉनीटर का प्रयोग किया जाता है।
  • उपयोग–व्यावसायिक रूप में, घरों में, मनोरंजन, चिकित्सा, आदि के क्षेत्र में।
(iv) पर्सनल कम्प्यूटर (Personal Computer)
  • यह कम्प्यूटर आकार में बहुत छोटे होते हैं।
  •  इसे इण्टरनेट से भी जोड़ा जा सकता है।
(v) लैपटॉप (Laptop)
  • लैपटॉप पर्सनल कम्प्यूटर की तरह ही कार्य करता है।
  • CPU, Monitor, Keyboard, Mouse तथा अन्य ड्राइव भी इसमें संयुक्त होते हैं।
 (vi) पामटॉप (Palmtop)
  • इस कम्प्यूटर का आकार बहुत छोटा होता है।
  • इसे हथेली पर रखकर प्रयोग किया जाता है।
(vii)सुपर कंप्यूटर (super computer)
  • यह कंप्यूटर विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली कंप्यूटर है
  • विश्व में प्रथम सुपर कंप्यूटर 1976 ईस्वी में cray 1 के रिसर्च कंपनी द्वारा विकसित हुआ था
भारत में सुपर कंप्यूटर

भारत का प्रथम सुपर कंप्यूटर  फ्लो सोल्वर था जिसे नेशनल एयरोनॉटिकल लेबोरेटरी (NAI) ने विकसित किया था।

CDAC(Centre for development of Advanced computing)
भारत में सुपर कंप्यूटर के विकास में यह सबसे महत्वपूर्ण संस्था है। इसके द्वारा विकसित सुपर कंप्यूटर है परम ,परम टेन थाउजेंड, परम पदम ,परम  अन्नत ,परम युवा आदि
C DOT
संस्था ने चिप्स (CHIPPS)नामक सुपर कंप्यूटर का विकास किया
DRDO
इस  संगठन ने अनुराग इकाई ने PACE नामक सुपर कंप्यूटर का विकास किया
BARC
मुंबई स्थित इस संस्था ने अनुपम सीरीज के सुपर कंप्यूटर का विकास किया
TATA
टाटा ने एक्रा नामक सुपर कंप्यूटर का विकास किया

MKRdezign

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